न एमपी न एमएलए, फिर भी,,,
यूपी 80 न्यूज़, लखनऊ
कुछ लीडर चुनाव जीतने के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श बदल देने के कारण इतिहास में दर्ज होते हैं। डॉ. सोनेलाल पटेल ऐसे ही लीडर थे। वे न कभी मुख्यमंत्री बने, न सांसद और न ही विधायक, लेकिन उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति मे मजबूत दखल दिया।
आज भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस यदि सभी गैर-यादव पिछड़ी जातियों को अपने राजनीतिक समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते है, और अन्य समाजों के दल स्थापित हुये तो उसके पीछे डॉ. सोनेलाल पटेल की राजनीतिक यात्रा का बड़ा योगदान है।
डा. सोनेलाल सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व, सम्मान और सत्ता में साझेदारी की राजनीति के पक्षधर थे। उनका मानना था कि लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं, बल्कि सत्ता संरचना में समान भागीदारी का भी नाम है। यही विचार उन्हें चौधरी चरण सिंह से कांशीराम तक और फिर बहुजन समाज पार्टी से अपना दल की स्थापना तक लेकर गया।
सोने लाल पटेल का जन्म 2 जुलाई 1950 को कन्नौज जिले के बागुलहाई गांव में हुआ था। उन्होंने कानपुर के पंडित पृथ्वीनाथ कॉलेज से एमएससी की उपाधि प्राप्त की और कानपुर विश्वविद्यालय से भौतिकी में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. युवावस्था ही वे समाज में प्रचलित जातिवाद और सामाजिक असमानता के मुखर आलोचक थे। राजनीतिक जीवन की शुरुआत सोनेलाल ने किसान नेता चौधरी चरण सिंह के प्रभाव में की। 1970 और 1980 के दशक में वे सामाजिक असमानता और जातीय भेदभाव के विरुद्ध आंदोलनों में सक्रिय रहे। इसी दौरान उनका परिचय कांशीराम से हुआ, जो उत्तर भारत में बहुजन आंदोलन का संगठन खड़ा कर रहे थे।
डॉ. सोनेलाल पटेल बहुजन समाज पार्टी के संस्थापकों में माने जाते हैं। उन्होंने विशेष रूप से कानपुर और मध्य उत्तर प्रदेश में पार्टी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे मानते थे कि दलित और पिछड़े वर्ग यदि साथ आएँ, तो उत्तर प्रदेश की सत्ता संरचना बदल सकती है। वर्ष 1995 में बहुजन राजनीति के लिए निर्णायक वर्ष था। कांशीराम द्वारा मायावती को केंद्रीय नेतृत्व सौंपे जाने के बाद कई वरिष्ठ नेताओं में असंतोष बढ़ा। सोनेलाल पटेल ने कांशीराम से किसान वर्ग के जातियों को नेतृत्व देने को कहा तो कांशीराम ने कहा था – ‘कुर्मी मेहनती कौम है लेकिन नेतृत्व नहीं कर सकती।’
सोनेलाल को भारी आघात लगा। डॉ. सोनेलाल पटेल का मानना था कि पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत होती जा रही है और पिछड़ी जातियो को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा। यह केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं था। यह बहुजन राजनीति के भीतर प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर उभरा वैचारिक विवाद भी था। क्या दलित–पिछड़ा गठबंधन में दोनों की बराबर हिस्सेदारी होगी, या नेतृत्व सीमित हाथों में केंद्रित रहेगा? यह सवाल आज भी विद्यमान है?
वर्ष 1995 में लखनऊ में आयोजित कुर्मी स्वाभिमान रैली उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक मोड़ साबित हुई। यह केवल जातीय सम्मेलन नहीं था; यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सार्वजनिक घोषणा थी। रैली का संदेश स्पष्ट था कि कुर्मी समाज केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि सत्ता का भागीदार बनेगा। इसी अभियान के बाद डॉ. सोनेलाल पटेल ने बसपा से अलग होकर 4 नवंबर 1995 को अपना दल की स्थापना की। डॉ. सोनेलाल पटेल पर डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का गहरा प्रभाव था। उन्होंने बौद्ध दर्शन को समानता, तर्कशीलता और जाति-विरोध का मार्ग माना। उन्होंने बौद्ध धर्म को केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना। सोनेलाल ने बौद्ध धर्म अपनाया भी।
उनके जीते जी अपना दल को कोई खास सफलता नहीं मिली । 4-5 विधायक आ जाते थे, खुद कभी विधायक-सांसद नहीं बन पायें। सोनेलाल के बढ़ते राजनैतिक रसूख से विधानसभा मे चुनावी गणित बनने- बिगड़ने लगे थे. अपना दल की वजह से दूसरे दलों के कुर्मी प्रत्याशी हारने लगे थे। लेकिन अपना दल का जोर बढ़ता गया. 18 अक्टूबर 2009 को कानपुर के निकट एक सड़क दुर्घटना में सोनेलाल की मृत्यु हुई। आधिकारिक रिकॉर्ड इसे सड़क दुर्घटना मानते हैं। बाद में परिवार के कुछ सदस्यों ने CBI जांच की मांग की और संदेह व्यक्त किया, इसे लेकर अभी तक कोई जांच नहीं हुई ।
डॉ. सोनेलाल पटेल ने स्वयं भाजपा के साथ स्थायी राजनीतिक गठबंधन नहीं किया। हां, उनके निधन के बाद पार्टी का नेतृत्व उनकी पत्नी कृष्णा पटेल और फिर उनकी बेटी अनुप्रिया पटेल के हाथों में आया। 2014 में अपना दल ने भाजपा के साथ गठबंधन किया। इस गठबंधन ने भाजपा को पूर्वांचल और गैर-यादव OBC समाज में मजबूत आधार दिया। अपना दल को राष्ट्रीय सत्ता में भागीदारी मिली। इस तरह से सोनेलाल के सपनों का दल परिवारवादी नेतृत्व की भेंट चढ़ गया।
सोनेलाल की दो बेटियाँ अभी राजनीति मे है हालांकि दोनों के राजनैतिक रास्ते अलग-अलग है। एक बेटी अनुप्रिया पटेल की राजनीति भाजपा-नीत NDA के साथ सत्ता में भागीदारी और गैर-यादव OBC प्रतिनिधित्व पर आधारित है। वहीं पल्लवी पटेल सामाजिक न्याय की परंपरागत राजनीति को विपक्षी गठबंधन सपा के साथ हैं। उन्होंने 2022 में सिराथू से तत्कालीन उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को हराकर अपना जलवा कायम किया है।
बहरहाल.. आज भाजपा की सामाजिक इंजीनियरिंग, समाजवादी पार्टी की PDA रणनीति और बहुजन राजनीति के नए प्रयोग सभी में गैर-यादव पिछड़ों की निर्णायक भूमिका दिखाई देती है, इसमे सोनेलाल का प्रमुख योगदान है।
डा. सोनेलाल पटेल जी की जन्म-जयंती पर नमन।











